सिंहासन खाली करो कि जनता आती है
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दिनकर जी, मकान खाली करो कि वो कब्ज़ा जमाने आते हैं...खुशदीप
सदियों की ठंडी बुझी राख़ सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है, दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, …
रविवार, फ़रवरी 06, 2011